आम की गुठलियों से हरियाली की क्रांति एक अनोखी पहल

Transcrição

नमस्कार, दोस्तों और हरियाली की ओर पोडकास्ट में आपका स्वागत है। मैं हूँ, आपका दोस्त, विकास और मेरे साथ है। मेरे सहहोषविमल, नमस्कार, विकास और सभी श्रोताओं को मेरा प्यार भरा नमस्कार। आज हम 1 ऐसे विषय पर बात करने वाले है जो मेरे दिल के बहुत करीब है और मुझे लगता है कि हर भारतीय के लिए बेहद प्रासंगिक है, खासकर गर्मियों के मौसम में। तुमने बिल्कुल सही कहा जब गर्मियों का मौसम आता है तो 1 चीज जो हर घर में, हर नुक्कड़ पर दिखती है, वो है आम। आम खाना किसे पसंद नहीं है, है न? अरे बिल्कुल। आम को तो फलों का राजा कहते हैं। उसकी मिठास, उसका रस उफ, बस नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाता है। और 1 बार जब आम खा लिया जाता है तो पीछे क्या बचता है। वही हमारी आज की चर्चा का हीरो है। आम की गुठली। हम में से ज्यादातर लोग उसे फेंक देते हैं, कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं। बिना सोचे की ये कितनी बड़ी क्षमता रखती है। सही कहा हम उसे बस कचरा समझ कर फेंक देते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए अगर हर गुठली 1 पेड़ में बदल जाए तो कितनी हरियाली होगी। हमारे शहरों, हमारे गाँवों की सूरत ही बदल जाएगी। इसी विचार के साथ हम आज बात कर रहे हैं आम की गुठली संग्रहण अभियान की। इसका सीधा सा मतलब है की हम आम की गुठलियों को इकट्ठा करें और उन्हें रोपण के लिए उपयोग करे ताकि हमारे आस पास और ज्यादा पेड़ उगे। यह सिर्फ 1 छोटा सा। कदम नहीं है विकास, यह हमारी मानसिकता में बदलाव है। कचरा कहने की बजाय हम उसे 1 संसाधन के रूप में देख रहे हैं। हम सोच रहे है की 1 फेंकी हुई चीज भी कैसे किसी काम आ सकती है? और इस अभियान के पीछे का विचार कितना सरल है। हर साल लाखों करोड़ों आम खाए जाते हैं। सोचिए अगर उन सब की गुठलियाँ सम्भाल ली जाए तो कितने नए पेड़ लग सकते हैं। यह तो 1 तरह से प्रकृति को उसका ही दिया हुआ तोहफा लौटा न हुआ। बिल्कुल। और सबसे अच्छी बात यह है की इसमें कोई भारी भरकम लागत नहीं लगती। हमें बस थोड़ी सी जागरूकता और थोड़ी सी मेहनत की जरुरत है। बस आम खाने के बाद गुठली को धोकर सुखा ले और उसे अलग रख दे। यहीं पर सामुदायिक भागीदारी का महत्व आता है। यह कोई 1 व्यक्ति का काम नहीं है, यह 1 सामूहिक प्रयास है। अगर हर घर, हर मोहल्ला, हर स्कूल इसमें शामिल हो जाए तो इसका असर बहुत बड़ा होगा। मैं अक्सर सोचता हूँ की बच्चों को इसमें शामिल करना कितना शानदार रहेगा। उन्हें ये सिखाना की कैसे 1 छोटी सी गुठली सी, 1 बड़ा पेड़ बन सकता है। उन्हें प्रकृति से जोड़ देगा। यह उनके लिए 1 प्रैक्टिकल साइंस क्लास होगी। हाँ, उन्हें ये पता चलेगा की पर्यावरण संरक्षण सिर्फ, भाषणों या किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि ये उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन सकता है। वे अपने हाथों से कुछ ऐसा कर रहे होंगे जिसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ेगा अच्छा विकास, ये तो हुई भावना की बात। अब जरा इसकी प्रक्रिया पर भी बात करे। कोई अगर इसमें शामिल होना चाहे तो उसे क्या करना चाहिए? प्रक्रिया बहुत सीधी है। बिमल सबसे पहले तो आम खाने के बाद गुठली को अच्छे से धो ले ताकि उस पर लगा सारा, गूदा साफ हो जाए। गूदा अगर लगा रह जाएगा तो वो सड़ने लगेगा। सही कहा स्वच्छता बहुत जरूरी है। और फिर धोने के बाद गुठलियों को धूप में अच्छी तरह सुखा ले। कम से कम कुछ दिन तो लगेंगे जब तक वो पूरी तरह से सूख न जाए। इससे फफूंद लगने का डर नहीं रहता और वो लंबे समय तक स्टोर की जा सकती है। तो 1 बार सूख गईं, फिर उन्हें कहाँ रखना है? आप उन्हें किसी हवादार जगह पर, किसी थैले में या डिब्बे में इकट्ठा कर सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है की वो नमी से दूर रहे। फिर जब आपके पास अच्छी मात्रा में गुठलियाँ जमा हो जाए तो आप उन्हें या तो खुद लगा सकते हैं या उन संगठनों को दे सकते हैं जो इस तरह के अभियानों में शामिल है। अच्छा, यह तो बहुत ही व्यवहारिक जानकारी है। लेकिन इन्हें कहाँ लगाना सबसे अच्छा रहेगा। क्या हम इन्हें कहीं भी लगा सकते हैं? नहीं, कहीं भी नहीं। सबसे अच्छा तो यह रहेगा की आप उन्हें ऐसी जगहों पर लगाए जहाँ उनकी देखभाल हो सके, जैसे अपने घर के आंगन में, स्कूल के मैदान में या किसी सामुदायिक पार्क में। लेकिन बड़े पैमाने पर इस अभियान का उद्देश्य उन बंजर, भूमियों, सड़कों के किनारे या उन जगहों को हरा भरा करना है, जहाँ पेड़ों की कमी है। हाँ, मुझे लगता है कि इसके लिए स्थानीय, नगर निगम या ग्राम पंचायत से बात करना भी अच्छा रहेगा, ताकि उन्हें ऐसी जमीन मिल सके, जहाँ बड़े पैमाने पर रोपण किया जा सके और उनकी देखभाल भी सुनिश्चित हो। बिल्कुल, सरकारी विभागों और गैर सरकारी संगठनों, एनजीओ के साथ मिलकर काम करना सबसे प्रभावी तरीका होगा। कई एन जी ओ तो पहले से ही ऐसे वृक्षा रोपण अभियानों में सक्रिय हैं। हम उन्हें अपनी गुठलियां दान कर सकते हैं। यह तो हुई प्रक्रिया। अब जरा इसके लाभों पर भी रोशनी डालते हैं। हरियाली बढ़ने से हमें क्या मिलेगा? लाभ तो अनगिनत हैं। विमल सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण तो है। पर्यावरण संतुलन पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, कार्बन डायऑक्साइड सोखते हैं, जिससे हवा साफ होती है। ये तो हम सब जानते हैं। और शहरी इलाकों में तो इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, जहाँ प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। यह 1 प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर का काम करेंगे। हाँ और पेड़ो से जमीन का कटाव भी रुकता है। मिटटी की उर्वरता बढ़ती है। बारिश लाने में भी पेड़ो की भूमिका होती है, जिससे भूजल स्तर भी बेहतर होता है। गर्मियों में तापमान को नियंत्रित करने में भी पेड़ों का बहुत बड़ा योगदान है। शहरों में हीट आईलैंड इफेक्ट को कम करने में यह बहुत मददगार होंगे। सोचो। अगर हर गली में आम के पेड़ हो तो कितनी ठंडी हवा, आएगी और सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, विमल इसका सामाजिक पहलू भी बहुत गहरा है। जब लोग 1 साथ मिलकर गुठलियाँ इकट्ठा करेंगे पौधे लगाएंगे तो 1 सामुदायिक भावना पैदा होगी। लोग 1 दुसरे से जुड़ेंगे बिल्कुल। 1 साझा उद्देश्य के लिए काम करना लोगों को करीब लाता है। यह उन्हें अपने आस पास के वातावरण के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बनाता है। उन्हें लगेगा की ये मेरा इलाका है, हमारी हरियाली है। हाँ और बच्चों के लिए तो ये 1 अद्भुत सीख है। उन्हें प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान सिखाने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है। वे देखेंगे कि उनके छोटे से प्रयास से कितना बड़ा बदलाव आ सकता है। 1 बात और क्या आपको नहीं लगता कि जब ये पेड़ बड़े होंगे तो उनमें फल भी लगेंगे। तो ये सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि भविष्य में फल और शायद पक्षियों के लिए 1 नया बसेरा भी होगा। हाँ, बिल्कुल ये सिर्फ पेड़ नहीं है। ये 1 इको सिस्टम का हिस्सा बन जाएंगे। पक्षी, गिलहरी और कई अन्य जीव जंतुओं को आश्रय मिलेगा। ये हमारी जैव विविधता को भी बढ़ावा देगा। यह सुन कर बहुत अच्छा लग रहा है। लेकिन विकास क्या? इस अभियान में कोई चुनौतियां भी है? चुनौतियां तो हर अच्छे काम में आती है। विमल सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण तो है। पर्यावरण संतुलन पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं। कार्बन डाय ऑक्साइड सोकते हैं, जिससे हवा साफ़ होती है। ये तो हम सब जानते हैं। और शहरी इलाकों में तो इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। जहाँ प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। ये 1 प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर का काम करेंगे। हाँ और पेड़ो से जमीन का कटाव भी रुकता है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। बारिश लाने में भी पेड़ों की भूमिका होती है, जिससे भूजल स्तर भी बेहतर होता है। गर्मियों में तापमान को नियंत्रित करने में भी पेड़ों का बहुत बड़ा योगदान है। शहरों में हीट आईलैंड इफेक्ट को कम करने में यह बहुत मददगार होंगे। सोचो। अगर हर गली में आम के पेड़ हो तो कितनी ठंडी हवा, आएगी और सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, विमल, इसका सामाजिक पहलू भी बहुत गहरा है। जब लोग 1 साथ मिलकर गुठलियाँ इकट्ठा करेंगे पौधे लगाएंगे तो 1 सामुदायिक भावना पैदा होगी। लोग 1 दुसरे से जुड़ेंगे बिल्कुल। 1 साझा उद्देश्य के लिए काम करना लोगों को करीब लाता है। यह उन्हें अपने आस पास के वातावरण के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बनाता है। उन्हें लगेगा की ये मेरा इलाका है, हमारी हरियाली है। हाँ और बच्चों के लिए तो यह 1 अद्भुत सीख है। उन्हें प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान सिखाने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है। वे देखेंगे कि उनके छोटे से प्रयास से कितना बड़ा बदलाव आ सकता है। 1 बात और क्या आपको नहीं लगता कि जब ये पेड़ बड़े होंगे तो उनमें फल भी लगेंगे। तो ये सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि भविष्य में फल और शायद पक्षियों के लिए 1 नया बसेरा भी होगा। हाँ, बिल्कुल ये सिर्फ पेड़ नहीं है। ये 1 इको सिस्टम का हिस्सा बन जाएंगे। पक्षी, गिलहरी और कई अन्य जीव जंतुओं को आश्रय मिलेगा। ये हमारी जैव विविधता को भी बढ़ावा देगा। यह सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है। लेकिन विकास क्या इस अभियान में कोई चुनौतियां भी हैं? चुनौतियां तो हर अच्छे काम में आती है। विमल सबसे पहले चुनौती है जागरूकता की कमी। ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है की उनकी फेंकी हुई गुठली सी 1 पेड़ बन सकता है। उन्हें इसकी अहमियत समझानी पड़ेगी सही कहा। और मुझे लगता है की बड़े पैमाने पर गुठलियों को इकट्ठा करना और उन्हें ठीक से संभालना भी 1 चुनौती हो सकती है। अगर सही तरीके से धोकर सुखाया न गया तो वो खराब हो जायेंगी। बिल्कुल। और फिर आती है रोपण की चुनौती। सिर्फ। गुटली बो देना ही काफी नहीं है, उसे सही जगह पर सही तरीके से बोना और फिर उसकी देखभाल करना भी जरूरी है। पानी देना, जानवरों से बचाना, यह सब भी अहम है। मतलब ये की ये 1 सतत प्रक्रिया है। सिर्फ 1 बार का इवेंट नहीं है। हमें दीर्घकालिक सोच के साथ काम करना होगा, यही बात है। लेकिन मुझे लगता है की अगर हम छोटे छोटे स्तर पर शुरू करें तो इन चुनौतियों से निपटना आसान होगा। अपने घर से, अपने मोहल्ले से, फिर धीरे धीरे इसे बड़े पैमाने पर ले जाया जा सकता है। हाँ, जैसे बूंद बूंद से सागर भरता है। और जब इतने सारे लोग 1 साथ मिलकर प्रयास करेंगे तो कोई चुनौती बड़ी नहीं लगेगी। मुझे याद है कुछ साल पहले कर्नाटक में इसी तरह का 1 अभियान चला था, जहाँ लोगों ने आम की गुठलियाँ इकट्ठा किये और उन्हें जंगल के उन इलाकों में फेंका जहाँ पेड़ों की कमी थी। बारिश के साथ उनमें से कई अंकुरित हुए। वाह। यह तो बहुत ही प्रेरणा दायक है। हमें ऐसे ही कुछ उदाहरणों से प्रेरणा लेनी होगी। और यह भी सोचना होगा की इसे और कैसे रचनात्मक बनाया जाए। जैसे की स्कूलों में प्रतियोगिता आयोजित करना। कौन सबसे ज्यादा गुठलियाँ इकट्ठा करता है? या कौन उन्हें सबसे अच्छे से संरक्षित करता है? या फिर स्थानीय पर्यावरण समूहों के साथ मिलकर वृक्षा रोपण दिवस मनाना। ये सभी बेहतरीन विचार है। मुझे लगता है कि ये अभियान सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं बल्कि हमारी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों के लिए 1 बेहतर भविष्य बनाने का 1 प्रतीक भी बन सकता है। सही कहा बिमल, हर छोटी गुठली में 1 बड़ा पेड़ बनने की क्षमता है, ठीक वैसे ही जैसे हर छोटे प्रयास में 1 बड़ा बदलाव लाने की क्षमता होती है। तो दोस्तों, अगली बार जब आप आम खाए तो उस गुठली को सिर्फ कचरा समझ कर, न फेंके, उसे धोए सुखाए और उसे 1 नए जीवन का अवसर दे। आप नहीं जानते की आपका ये छोटा सा कदम कितना बड़ा फर्क डाल सकता है। आइए, हम सब मिलकर, इस गुठली सी, हरियाली अभियान का हिस्सा बनें, अपने आस पास हरियाली लाएं, अपनी धरती को फिर से हरा भरा बनाये, ये हमारी जिम्मेदारी है और हमारा कर्तव्य भी। और इस प्रयास में अगर आपको कोई मदद चाहिए या कोई जानकारी चाहिए तो हमें जरूर बताए। हम हमेशा आपके साथ है। इसी के साथ मैं बिमल और विकास आज के लिए आपसे विदा लेते हैं। अगले पोडकास्ट में फिर मिलेंगे 1 नए विषय के साथ, तब तक के लिए हरियाली फैलाते रहिये और स्वस्थ रहिये। धन्यवाद धन्यवाद नमस्कार।

Comece a criar de graça

Transforme áudio em vídeos, transcrições e conteúdo para redes sociais em minutos

Experimente hoje

Enviar feedback